Thursday, 20 July 2017

नेल्सन मंडेला के संघर्षो को जाने

दोस्तों एक ऐसा भी समय था जब हर सुविधाएं जंग के आधार पर बटी हुई थी। बात चाहे बस की सीट की हो या फिर सार्वजनिक जगहों पर मिलने वाली किसी भी सुविधाओं की हर जगह रंग के आधार पर गोरों को अच्छी और कालों को बूरी सर्विस मिलती थी। वैसे तो इसका इफेक्ट हर देषों में लगभग कहीं थोड़ा कहीं ज्यादा था लेकिन दक्षिण अफ्रीका में हद ही हो गई थी। वहां के कूल अबादी के तीन चैथाई काले लोग थे और उनके देष के इकोनामी उन्हीे के मेहनत पर चलती थी। वैसे  तो दक्षिण अफ्रीका मे रेगों को लेकर भेद भाव बहुंत पहेले से था लेकिन नेषनल पार्टी के सरकार ने 1948 में यह नियम गना दिया कि काले और गोरों लोग अलग-अलग जगहों पर रहेंगे और हर सुविधाएं भी उनके रंगों के हिसाब से बाट दिया गया लेकिन बुराइ पर तो हमेषा अच्छाई की ही जीत होती आयी है। नेलषन मंडे़ला के संधर्शो  ने इस रंग भेद के नियम को खतम करवा दिया जिसके बाद सभी  को सामान हक मिलने लगा लेकिन यह इतना आषान भी नहीं था।


इसके लिए मंडेला को अपने जीवन का लगभग 28 साल जेल में बीताना पढ़ा था। मंडे़ला भी गांधी जी के राह पर चलने वाले इंषान थे उन्होने बिना हथियार उठाये बिना खून बहाये यह काम कर दिखाया था। दोस्तों आइऐ उनके बारें में डिटेल से जानते हैं। नेलषन मंडेला का जन्म 18 जुलाई 1918 को अफ्रीका के मवेजो गांव में हूआ था। उनकी मां का नाम नोस्केटी और पिता का गेटला हेनरी था। जन्म के समय नेलषन मंडेला का नाम उनके घर वालों ने रोलिल हाला रखा था जिसका मतलब षरारती होता है। लेकिन स्कूल के टीचर ने उनका नाम बदलकर नेलषन रख दिया। ने अपनी षूरू की पढ़ाई कलार्क बेरी मीसनरी स्कूल से षूरू की मंड़ेला जब बारह साल के थे तभी उनकी पिता की मृत्यु हो गई लेकिन उनके ज्वाइन फैमली ने उन्हें पिता की कमी महसूष कभी नहीं होने दी और आगे की पढ़ाई के लिए पूरी हेल्प करते रहे क्योंकि नेलषन परे परिवार में एक मात्र सदस्य थे जो स्कूल गए थे। उनकी ग्रेजूएषन की पढ़ाई हेल्डटाउन काॅलेज में हूई थी। हेल्डटाउन स्पेसली काले लोगों के लिए बनाया गया काॅलेज था। इसी काॅलेज में मंड़ेला की मूलाकात अलीवर्डटाम्बो से हूआ जो जीवन भर उनके दोस्त रहे और रंग भेद की लड़ाई में हमेषा उनके साथ रहे।


 काॅलेज के समय से ही उन्होने काले लोगों के भेदभाव के खिलाफ लड़ाई षुरू कर दी थी और लोगों को ईकटठा करना षुरू कर दिया था। जिसकी वजह से उन्हें काॅलेज से भी निकाल दिया गया था। 1994 में वे अफ्रीकन नेषनल कांग्रेष में षामिल हो गए जिसमें रंग भेद के खिलाफ जंग पहले से ही षूरू कर रखा था फिर वे 1947 में वे पार्टी के सचिव चूने गए अब उनके साथ धिरे-धिरे करके बहूंत सारे लोग जूड़ चूके थे और अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ रहे थे लेकिन 1961 में मंड़ेला और उनके कूछ दोस्त के खिलाफ देष द्रोह का केष चला और उन्हें जेल में बंद कर दिया गया गया हालाकि उन्हें बाद में उन्हें निर्दोश माना गया और वे छूट गए लेकिन फिर से 5 अगस्त 1962 को उन्हें मजदूरों को उकसाने के आरोप में फिर से गिरफतार कर लिया गया और दो साल तक उन पर केष चलने के बाद 12 जूलाई 1964 को उन्हें उम्र कैद की सजा सुनाई गई।


 सजा के लिए उन्हें सबसे कड़ी सुरक्षा वाली जेल में भेजा गया लेकिन उसके बाद भी उनका हौसला कम नहीं हुआ उन्होनें जेल में भी अष्वेत कैदियों को अपना अधिकार दिलाना षूरू कर दिया उधर दूसरी तरफ उनके पार्टी ने भी उन्हें छूड़ाने की पूरी प्रयास की लेकिन वह असफल रहे और नेलषन मंड़ेला पूरी 27 साल तक उस काल कोठरी में कैद रहे आखिरकार 1989 को दक्षिण अफ्रीका में सरकार बदली और उदारवादी नेता थ्ॅ ब्संताम देष के प्रेषीडेन्ट बने उन्होने उनके पार्टी के सधर्श को देखते हूए अष्वेत लोगों पर लगे सभी प्रतिबंध को हटा दिया और उन सभी कैदियों को छोड़ने का फैसला किया जिन पर खून खराबा जैसी बड़ी अपराधिक केषेस नहीं चल रही इस तरह 1 फरवरी 1990 को मंड़ेला के सामने जिन्दगी की सोर्योदय हूआ और वे जेल से छूट गए और उनके बाद 1994 में दक्षिण अफ्रीका में प्रेसीडेंट का चुनाव हूआ इस चुनाव में अष्वेत यानी काले लोग भी पार्टी सिपेट कर सकते थे। मेंडेला ने इस चुनाव में पाटि सिपेट किया और उनकी पार्टी अफ्रीकन नेषनल कांग्रेष ने बहूमत के साथ सरकार बनायी। 10 मई 1994 को मंड़ेला अपने देष के सबसे पहले अष्वेत राश्ट्रपति बने और बची खुची सभी अधिकारों को गोरे और काले सभी लोगों के लिए बराबर कर दिया।


नेलषन मंड़ेला बहूंत हद तक महात्मा गांधी की तरह अहिंषक मार्ग के समर्थक थे उन्होने गांधी को अपना प्रेरणा स्त्रोत माना था। इसी वजह से उन्हे अफ्रीकी गांधी भी कहा जाता है। नेलषन मंड़ेला को 1990 को भारत के सबसे बड़ा पुरुस्कार भारत रत्न दिया गया था। वे ऐसे दूसरे विदेषी थे जिन्हें भारत रत्न दिया गया था इससे पहले 1980 में मदर टेरेसा को दिया गया था। उसके बाद 1993 में उन्हें परि दूनिया के षांति के लिए सबसे बड़े पुरुस्कार नोबल पुरुस्कार से नवजा गया। दोस्तों मंड़ेला जीवन भर रंग भेद के अगेंष लड़ते रहे और दक्षिण अफ्रीका में अष्वेतों को उनके अधिकार दिलाने के बाद 5 दिसम्बर 2013 को 95 साल के उम्र में इस दूनिया को अलविदा कह गये। मुंड़ेल7ा का कहना था कि जब कोई व्यक्ति अपने देष और लोगों की सेवा को अपने कर्तव्य की तरह समझता है तो उन्हें उस काम को करने में षांति मिलती है। मुझे लगता है कि मेने वो कोषिष की है और इसलिए मैं षांति से अंत काल तक सो सकता हूँ।   

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