Thursday, 20 July 2017

जैक मा- ने इससे पहले कभी भी इंटरनेट नहीं चलाया था

July 20, 2017
हारने वाले हमेशा असफलता के ड़र के बारे में सोंचते हैं। लेकिन जितने वाले हमेशा सफलता के पूरुस्कार के बारे में सोंचते हैं। दोस्तों मैं आपको अली बाबा ड़ाट काम के फाउन्डर और इस समय चीन के सबसे धनी व्यक्ति जैक मा के सफलता के कहानी के बारे में बताने जा रहा हूँ। जैक मा विश्व के सबसे सफल इन्टरप्रिन्योर में से एक हैं। उनकी कूल सम्पत्ति 20 मिलियन ड़ालर आंकी गई है। दोस्तों जैक ने यह सफलता इतनी आसानी से नहीं पायी है। उनके संघर्षो को अगर आप जानेंगे तो आश्चर्य  करेंगे कि इतनी असफलताओं के बाद भी कोई आदमी आगे बढ़ते रहने रहने की सोंच सकता है। जैक मा का जन्म 10 सितम्बर 1964 को चीन की एक छोटे से गाँव में हूआ था। जब वे 13 साल के थे तभी उन्होने इंग्लिश  सिखनी शुरु कर दी थी।




ऐसा चीन में बहूँत कम लोग ही करते थे क्योंकि उस समय चीन की प्रमुख भाशा चीनी ही थी और इंग्लिष सिखना जरुरी नहीं माना जाता था। इंग्लिष सिखने के लिए उन्होने किसी षिक्षक का सहारा नहीं लिया था बल्कि वे टूरिस्ट गाइड बन गए थे और टूरिस्टों को धूमाने के दौरान वे उनसे इंग्लिष मं बातें करने की कोषिष किया करते थे। उन्होने यह काम करीब 9 साल तक किया जिससें उन्हें इंग्लिष का अच्छा नालेज हो गया था। दोस्तों जैक मा का वास्तविक नाम मा यू न है। इन विदेषिसों को गाईड करते करते उनकी एक विदेषी व्यक्ति से गहरी मित्रता हो गई जो उन्हें पत्र लिख करता था और उसी विदेषी मित्र ने उन्हें जैक नाम दिया क्योंकि चीनी में उनका नाम बोलना और लिखना बहँूत ही कठीन था। तब मा यू न को तब से जैक के नाम से जाना जाता है। जैक का पढ़ाई में मन बिल्कूल ही नहीं लगता था।




इसी वजह से 4 क्लास में 2 बार और 8 क्लास में 3 बार फेल हो गए कैसे भी करके ये सभी इक्जाम पास की तो ग्रेजुऐषन के इंट्रेस इक्जाम में उन्हें 5 बार असफलताएँ मिली उसके बाद जैक ने एक बहँूत ही खाराब माना जाने वाला इंस्टियूट में दाखिला ले लिया जहाँ से 1988 में उन्होने इंग्लिष ग्रेजुएषन के इक्जाम पास की। जैक मा की कैरियर की षुरुवात भी बहँूत ही असफलताओं से भरा हुआ था। उन्होने 30 अलग-अलग जगहों पर नौकरी के लिए ओदन किए लेकिन उन्हें हर बार नीराषा ही हाथ लगी इसी बीच वो एक ज्ञथ्ब् में नौकरी केे लिए गए उस समय ज्ञथ्ब्  चीन में पहली बार आया था। इस नौकरी के लिए 24 लोगों ने आवेदन किया था जिसमें से 23 लोग सलेक्ट हो गए लेकिन एक मात्र जैक का चयन नहीं हूआ। षुरु से इंग्लिष अच्छी होने के कारण बाद में उन्हें एक काॅलेज में ऐजर लैक्चरार रख लिया गया। उसके बाद उन्होने कूछ दिनों तक ट्रांसलेटर का काम किया। 1995 के षुरुवात में वे अपने दोस्त से मिलने अमेरीका गए।


जहाँ उन्होने पहली बार इंटरनेट देखा। जैक मा ने इससे पहले कभी भी इंटरनेट नहीं चलाया था। जैक ने जब पहेली बार इंटरनेट चलाया था तो उन्होने  बीएड शब्द खोजा उन्हें बीएड संबंधित बहूँत से जानकारीयाँ अलग-अलग देशों से प्राप्त हूई। लेकिन वह यह देखकर चैक गए की उस सर्च में चीन का नाम कहीं भी नहीं था। फिर उन्होने चीन के बारे में सानमान्य जानकारीयाँ ढ़ँढ़ने की कोषिष की लेकिन फिर उन्होने पाया कि चीन की कोई भी जानकारियाँ इंटरनेट पर मौजूद नहीं थी। जैक को इंटरनेट पर एक अच्छा आफरचैनूटी दिख रहा था। जिसके बाद जैक ने इंटरनेट से ही जूड़ी हूई इसी काम को करने का सोंचा उन्होने थोड़ा और रिषर्च किया और फिर अपने देष के छोटे बड़े बेवसाय को इंटरनेट से जोड़ने के लिए अपने फ्रेंड़स के साथ मिलकर एक वेबसाईट बनाई जिसका नाम - चाईना योलो पेज था। कान्सेप्ट अच्छा होने के बाउजूद उन्हें चीन में इसके लिए फंडिग नहीं मिल पायी जिसके कारण उन्हें इसे भी बंद करना पड़ा। दोस्तों इतने असफलता के बाद तो कोई षायद ही होगा जो आगे फिर कूछ और करना चाहेगा।


लेकिन नहीं जैक ने अपने पुराने कमियों को ध्यान में सख्ते हूए अपने वाईफ और अन्य 20 लोगों के साथ मिलकर उसी कांसेफ्ट के साथ फिर से एक नया वैबसाईट बनाया जिसका नाम अली बाबा डाट काॅम था। इसमें भी षुरुवात में उन्हें थोड़ी सी प्राब्लम फेस करनी पड़ी लेकिन साफ्ट बैंक के एक बड़े निवेश  के साथ कंपनी ने कभी भी पिछे मुड़कर नहीं देखा और देखते ही देखते दुनिया की सबसे बड़ी ई-काॅमर्स कंपनी ई बे को अगले 4 सालों के अन्दर ही अन्दर देश से बाहार का रास्ता दिखा दिया। जैक मा आज दूनिया के रिचेश्ट पर्सन में गिने जाते हैं। उनकी कूल संपत्ति 20 मिलियन से भी ज्यादा है।




दोस्तों अली बाबा की नेटवर्क फेसबूक से भी कहीं ज्यादा है और जितना कमाई एमाजान और ई-बे मिलकर करती हैं उससे ज्यादा जैक की कंपनी अकेले करती है। दोस्तों हमें असफलताओं से धबराना नहीं चाहिए बल्कि उसका समझदारी के साथ मिलकर मुकाबला करना चाहिए। क्योंकि वक्त हमेषा एक सा नहीं होता है। अगर आपकी जिंदगी में अभी छांव है तो इंतजार किजिए सफलता की किरन आपकी जिंदगी को भी रोषन करेगी। दोस्तों किसी काम में असफलता मिलने पर हतास न हों असफलता तो आपको ज्यादा समझदारी से उसी काम को दुबारा करने का मौका देती है।


आपका बहुमूल्य समय देने के लिए बहुत -बहुत  धन्यवाद....दोस्तों मैं हर रोज एक नए  प्रेरणा दायक  जीवन की सच्ची कहानी लेकर आता हु  दोस्तों अगर  आप हमारी  कहानी को मिस नहीं करना चाहते तो  कृपया  हमारे फेसबुक पेज को लाइक (LIKE ) करले  एक क्लिक  में।  आपको ये कहानी कैसी लगी हमें  कमेंट  (COMMENT ) करके जरूर बताये और अभी तक आपने  हमारे  ब्लॉग  को  सब्सक्राइब (SUBSCRIBE )  नहीं किये है तो  जल्दी से  मुफ्त  में  सब्सक्राइब (SUBSCRIBE ) करलें ताकि जब भी मैं कोई पोस्ट  डालू  तो सबसे पहले आप तक  नोटिफिकेश (सन्देश )पहुँच जाये।

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भारत की बहादूर बेटी- कल्पना चावला

July 20, 2017
दोस्तों इस दूनिया में जन्में हूए सभी लोगों को एक न एक दिन इस खूबसूरत जहाँ को छोड़कर जाना होता है। मगर दूनिया में कूछ लोग सिर्फ जिने के लिए आते हैं। मौत तो महज सिर्फ उनकी षरीर को खत्म करती है। मैं बात करने जा रहा हँू भारत की बहादूर बेटी कल्पना चावला की। भले ही 1 फरवरी 2003 को कोलंबिया स्पेषटल दूरधटना ग्रस्त के साथ कल्पना की उड़ान रुक गई लेकिन दूनिया के लिए वह आज भी एक मिषाल है। दोस्तों सोंच कों कोई नहीं रोक सकता सोंच हमेषा उड़ान भरती आई है और भरती रहेगी। अंत्रिक्ष की परी कहे जाने वाली कल्पना चावला का जन्म हरियाणा के करनाल में हूआ था।




कल्पना अंतरिक्ष में जापे वाली पहली भारतीय थी। उनकी पिता का नाम बनारषी लाल और माता का नाम संज्योति है। बचपन में सभी लोग उन्हें मोटू कह कर पूकारते थे। दोस्तों कल्पना नाम के अनूरुप ही बचपन से ही वे कल्पना भरी सोंच रखती थी। वो हमेषा आकाष और उसकी ऊँचाइयों के बारे में सोंचती रहती। अपने पापा से विमान और चाँद तारों के बारे में बात किया करती थी। कल्पना की प्रारंभिक पढ़ाई करनाल के टाइगोर स्कूल में हूई थी। फिर कस्कूल में हूई थी। फिर कल्पना ने 1982 में चंड़ीगढ़ इंजिनियरिंग काॅलेज से ऐड़ोनाटिकल इंजिनियरिंग की की ड़िग्री ली उसके बाद अपने ख्वाबों को पूरा करने अमेरीका चली गई जहाँ उन्होने कोलूराटो इनिवरसिटी से पीएचड़ी की उपाधी प्राप्त की कल्पना को 1988 में नाषा में षामिल कर लिया गया। जहाँ रह कर उन्होने बहूँत सारे रिषर्च किए।





उनकी लगन और मेहनत को देखते हूए बाद में चलकर अंतरिक्ष मिषन की टाप 15 की टीम में षामिल कर लिया गया और देखते ही देखते उन 6 लोगों की टीम में उनका नाम आ गया जिन्हें अंतरिक्ष में भेजा जाना था। और अब इसी तरह कल्पना की सपनो को पंख लग चूके थे। उनका एक अंतरिक्ष मिषन 19 Novmbar  1997 को 6 अंतरिक्ष यात्रियों के साथ अंतरिक्ष स्पेसटल कोलंबिया कि उड़ान STST87 से षुरु हूआ। कल्पना चावला अंतरिक्ष मे उड़ाने वाली पहली भारतीय महिला थी। यह मिषन सफलता पूर्वक 5 दिसम्बर 1997 को समाप्त हूआ उस मिषन के बाद भारत के टाइलेंट को पूरे विष्व में पहचाना जाने लगा जिस समय भारत के लागों को अंतरिक्ष की समझ भी नहीं थी।




उस समय भारत की बेटी कल्पना चावला ने अंतरिक्ष में जाकर पूरे विष्व में भारत का परचम लहरायी थी। सभी ने उनके जज्बे को सलाम किया और 5 साल के बाद पुनः नाषा ने उन्हें अंतरिक्ष में जाने के लिए चुना। कल्पना चावला की दूसरी उड़ान 16 जनवरी 2003 को कोलंबिया स्पेसटल से ही आरंभ हूई यह 16 दिन का मिषन था। इस मिषन में उन्होने अपने सहयोगी के साथ मिलकर लगभग 80 परिक्षण और प्रयोग किए लेकिन फिर वह हूआ जिसे सोंचकर आँखें भर आती है। हाथों में फूल लिए हूए स्वागत के लिए खड़े वैज्ञानिक और अंतरिक्ष प्रेमी सहित पूरा विष्व उस नजारे को देखकर षोक में डूब गया।





धरती पर उतरने से सिर्फ 16 मिनट ही रह गए थे। कि अचानक सटल बलास्ट हो गया और कल्पना के साथ ही साथ सभी अंतरिक्ष यात्री मारे गए। दोस्तों कल्पना भले ही उस दूर्धटना की षिकार हूई हो लेकिन वो आज भी वो हमारे दिलों में जिन्दा हैं। वो आज पूरे विष्व के लोगों के लिए आदर्ष हैं। दोस्तों मैं पुनः वहीं बात दोहराना चाहता हूँ कि कुछ लोग दूनिया में सिर्फ जिने के लिए आते हैं। मौत तो महज उनके षरीर को खत्म करती है।



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शहीद भगत सिंह- चाहते तो माफी मांगकर फांसी से बच सकते थे

July 20, 2017
सी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं। देखना है जोर कितना बाजूये कातिल में हैं।शहीद भगत सिंह जिन्हें 23 मार्च 1931 को 23 वर्श 05 महिने 23 दिन के अल्प आयु में ब्रिटिस सरकार द्वारा सुखदेव और राजगुरु के साथ फांसी की सजा दी गई। अगर भगत सिंह चाहते तो माफी मांगकर फांसी से बच सकते थे। लेकिन मातृभूभि के इस सच्चे सपूत को झूकना पसंद नहीं था। कि जिंदगी तो अपने दम पर जिए जाती है। दूसरों कि कंधे पर तो जनाजे उठा करते हैं। भगत सिंह की विचार धारा महात्मा गाँधी से बिल्कूल ही अलग थी। उनका मानना था कि अगर हमें आजाद होना है तो इंट का जावाब पत्थर से देना ही होगा वो कहते थे कि जब सत्य का दूरुपयोग हो तो वो हिंसा बन जाती है। लेकिन जब सत्य का उपयोग किसी सहीं कार्य को करने में कर रहें हैं तो वह एक न्याय का रुप बन जाती है। दोस्तों उन्हाने लिखा है।




मेरे सिने में जो जख्म है वो सब फूलों के गुच्छे हैं। हमें तो पागल ही रहने दो हम पागल ही अच्छे हैं। भगत सिंह का जन्म 27 सितम्बर 1907 को पंजाब के जिला लायल पुर के बंगा  गांव के एक सिख्ख परिवार में हूआ था। बंगा गांव जो कि अब पाकिस्तान में है। भगत सिंह का जब जन्म हूआ था तब उनके पिता सरदार किषन सिंह और उनके चाचा अजित सिंह और स्वर्ण सिंह अंग्रेजों के खिलाफ खड़े होने के कारण जेल में बंद थे। भगसिंह के पैदा होने वाले दीन ही उनके पिता और चाचा को जेल से रिहा किया गया था। इस बात से भगत सिंह के घर में खूषियाँ और बढ़ गई थी। भगत सिंह पढ़ाई के लिए दूसरे सिख्खों की तरह लौहार के ब्रिटिस वाले स्कूल में नहीं गए थे। क्योंकि वे ब्रिटिस सरकार की षिक्षा नहीं लेना चाहते थे।






इसीलिए उन्होने दयांनद वैदिक हाईस्कूल में जाकर पढ़ाई की जो कि आर्य सामाज की ही एक संस्था थी। 1919 में जब वह केवल 12 साल के थे। उस समय जलिया वाला बाग में हजारों बेगुनाह लोगों को मार दिया गया। उनके दिमाग में यह बात ठेंस कर गई थी। इसीलिए 14 वर्श की ही आयु में अपने और अपने देष की रक्षा के लिए उन्होने अंग्रजों को मारना षुरु कर दिया था। वे हमेषा से ही गाँधी जी के अहिंसक होने के विरोध करते थे। क्योंकि चैरा चैरी कांठ में मारे गए बेकसूर लोगों के पिछे का कारण अहिंसक होना ही था जब चैरा चैरी कांठ हूआ था उस समय भगत सिंह जी स्कूल में पढ़ाई कर रहे थे। लेकिन जब उन्होने इस धटना के बारे में सूना तो 50 किलो मीटर चलकर वह धटना वाले जगह पर पहँूच गए। पहँूचने के बाद उन्होने जो देखा वो बहँूत ज्यादा दर्दनाक था। भगत सिंह ने उस षहिंदों का बदला लेने की ठान ली और खून से सनी हूई मिट्टी मूट्ठी में भरकर घर लेकर आए उसके बाद से ही भगत सिंह ने युवाओं को इक्टट्ठा करना षुरु कर दिया और एक अभियान षुरुवात की जिसका मुख्य उद्देष्य इंट का जावाब पत्थर से देकर ब्रिटिस राज्य को खत्म करना था।





युवाओं पर भगत सिंह का बहँूत बड़ा प्रभाव पड़ा और और इसी प्रभाव को देखते हूए ब्रिटिस पुलिस ने 1927 में भगत सिंह को अपनी हिरासत में ले लिया और उनके उपर यह आरोप लगाया कि वे अक्टूबर 1926 में हूए लौहार बम धमाके में षामिल थे। हालाकि 5 हफ्ते बाद जामानत में उन्हें रिहा कर दिया गया। ब्रिटिस सरकार मजदूरों के विरोध में एक बिल पारित करवाना चाहती थी। क्योंकि उन्हें भारतीय आम लोगों कि परेषानियों से कूछ भी लेना देना नहीं था। लेकिन भगत सिंह, चन्द्रषेखर आजाद और उनके यह दल को यह बिलकूल भी पसंद नहीं था। कि देष की आम इंषान जिनकी हालात पहले से गुलामी के कारण खाराब हो रखी है वह और खाराब हो जाए। इसी बिल की विरोध करने के लिए भगत सिंह और उनके साथी बटूकेष्वरदत्त  ने दिल्ली की केन्द्रीय असेम्बली में 8 अप्रेल 1929 को बम फेंके, बम फेकने का मकषद किसी का जान लेना नहीं था। उस बम के निर्माण के समय उसमें विस्फोटक की मात्रा नहीं कीे बराबर थी।



उनका मकषद केवल बम के आवाज से ब्रिटिस लोगों को डराना था। ताकि वह बिल पास न हो सके। बम फेकने के बाद भगत सिंह औरउनके साथी ने अपनी इच्छा से गिरफ्तारी दे दि ताकि यह बात पूरे देष में फैल जाए और देष के अन्य भारतीय लोगों के अन्दर भी स्वतन्त्रता की भावना पैदा हो सके। देष की आजादी के लिए अपनी जान की परवाह किए बिना लड़ने वाले स्वतन्त्रता सेनानी भगत सिंह, राजगुरु और सूखदेव को 13 मार्च 1931 की षाम करीब 7 बजकर 33 मिनट पर फांसी दे दी गयी और मात्र 23 वर्श की छोटी आयु में इस बीर सपूत ने हंसते-हंसते फांसी की फंदे को चूम लिया और उनके नाम के आगे एक और पद्वी जोड़ दिया गया षहिद, षहिद भगत सिंह। दोस्तों व्यक्ति को कूचलकर कभी भी विचारों को नहीं मारा जा सकता। आज भी षहिंद भगत सिंह हमारे लिए एक बहँूत बड़े प्रेरणा स्त्रोत हैं।    



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कार को दुनिया में पहले लाने वाले- हैनरी फोर्ड, कहते है की...

July 20, 2017
जब सब कूछ आपके खिलाफ जा रहा हो तो याद रखिए हवाई जहाज हवा के विरूद्ध उड़ान भरता है उसके साथ नहीं। ऐसा कहना है हैनरी फोर्ड़ का जिन्हें आधुनिक कारों का जनक कहा जाता है। हैनरी ने कार को दूनिया भर में इतना लोकप्रिय और सस्ता बना दिया जिसे एक आम आदमी आसानी से खरीद सकता है और उसका लाभ उठा सकता है। लेकिन ऐसा कर दिखाना तो इतना आसान तो बिल्कूल भी नहीं था। आइए हम षुरू से स्टार्ट करते हैं। हैनरी फोर्ड का जन्म 30 जूलाई 1863 को अमेरीका के ग्रीन फील्ड नाम के जगह पर हूआ था। हैनरी बहँूत ही गरीब घर में पैदा हूए थे। उनके पिता विलियम फोर्ड एक बहँूत ही साधारण से किसान थे। बचपन में हैनरी का खिलौना अन्य छोटे बच्चों से अलग हूआ करता था। उन्हें खिलौने से ज्यादा लोहे के औजारों से खेलना पसंद था।


5 वर्श की आयु में हैनरी का एडमिषन गाँव केे पास के एक स्कूल में ही कराया गया था। जहाँ उन्होने अपनी षुरू की पढ़ाई की और फिर पैसे न होने की वजह से आगे की पढ़ाई न कर सके इसीलिए उनके पिता चाहते थे कि हैनरी एक अच्छा किसान बने। लेकिन हैनरी को खेतों में काम करना बिल्कूल भी पसंद नहीं था। हैनरी फोर्ड बिना धोड़ो के चलने वाली गाड़ी बनाना चाहते थे और उसके लिए रात-रात भर जग कर वो ऐक्सपेरिमेंट किया करते थे। दरअसल उस समय गाड़ियाँ तो बननी षुरू हो गई थी। लेकिन वह इतनी महंगी हूआ करती थी की अमीर पैसे वाले लोगों को उसे खरीदने के लिए बहँूत सोंचना पड़ता था और बात की जाए आम आदमी की तो वो उनके लिए एक सपना सा था।


उन्हें गाड़ी के ऐक्सपेरिमेंट के लिए पैसे की जरूरत पड़ने लगी और इसी लिए वह 16 वर्श की उम्र में घर छोंड़कर डेटट्राईट में उन्होने स्ट्रीम इंजन की एक कंपनी में काम किया वो कहते थे कि उन्हें इस काम को करने बहँूत मजा आता था। क्योंकि यह भी औजारों से संबंधित ही काम था। कूछ सालों तक उस कंपनी में काम करने के बाद वह वहाँ के सिनियर इंजिनियर बन गए जिससे उन्हें अच्छी सैलरी भी मिलने लगी लेकिन पूरी सैलरी कार के ऐक्सपेरीमेंट में खतम हो जाती थी। इसीलिए वो और पैसों के लिए पार्ट टाईम जाब भी किया करते थे। हैनरी फोर्ड़ एक आम आदमी से दोगुना काम किया करते थे। आखिरकार उनका मेहनत रंग लाया और बहँूत सारा ऐक्सपेरिमेंट के बाद 1896 में उन्हाने अपनी पहेली कार बनाई।



 जब कार इंजन स्टार्ट हूई उस समय लगभग रात के तीन बज रहे थे और बारिस भी खूब हो रही थी। लेकिन ऐक्साईटमेंट इतना ज्यादा था कि उन्होने उसी बारिस में अपनी कार निकाली और घर के बाहर चलाने लगे। लोग जोर-जोर से आवाज सुनकर बाहर आ गए और उस कार को देखकर आष्चर्य करने लगे उसके बाद हैनरी का मनोबल बढ़ाया। कूछ दिनो के बााद हैनरी ने वह गाड़ी बेंच दी और इससे मिलने वाले पैसे और कूछ और पैसे अपने पास से मिलाकर उन्होने 1899 में एक कंपनी जिसका नाम डिट्रायट आटोमोबाईल था।



 इस कंपनी ने 25 कारें भी बनाकर बेंची लेकिन पैसे की कमी हाने के कारण उस कंपनी को बंद करना पड़ा। हार न मानते हूए 30 नवम्बर 1901 में उन्होने अपने कूछ अमीर दोस्तों के साथ मिलकर फिर से एक और कम्पनी खोली जिसका नाम हैनरी फोर्ड़ था लेकिन दोस्तो से मतभेद होने के कारण उन्हें भी बंद करना पड़ा। उनके दोस्त चाहते थे कि कार को महंगा बेचा जाए और केवल अमीर लोगों को ही टारगेट किया जाए। लेकिन हैनरी की सोंच षुरू से ही अलग थी और दोनो के विचार न मिलने के कारण उस कम्पनी को बंद करना पढ़ा था। उसके बाद सभी पुराने बातों से सीख लेते हूए हैनरी फोर्ड़ ने 16 जून 1903 को एक और कम्पनी खोली जिसका नाम फोर्ड़ था। फोर्ड़ कम्पनी को दुनिया के सामने लाने के लिए उन्होने अपनी एक कार को रेसिंग ट्रैक पर उतारी जिसका माड़ल फोर्ड़ 999 था। इस कार ने मानो धूम ही मचा दिया था।



यह कार उस रेस में फस्ट आई जिसके कारण हैनरी फोर्ड और उनकी कम्पनी को लोग जानने लगे। 1909 में उनकी कम्पनी एक टी माडल कार बनायी जोकि बहँूत प्रसिद्ध हूई। उसके बाद मानो पैसों की बारीस ही हो गयी और देखते ही देखते फोर्ड ने हजारो लाखों कारों कि बिक्री करनी षुरू कर दी। उनकी सफलता का एक राज यह भी था कि उनका हर कारीगर किसी एक काम का प्रोफेषनल था और वह एक ही काम करता था जिसमें उसको महारत हांसिल है। सस्ती कारो से हमारी लाईफ स्टाईल बदलने के बाद आखिरकार 7 अप्रेल 1947 को हैनरी फोर्ड ने इस दूनिया को अलविदा कह दिया। दोस्तों हैनरी फोर्ड का मानना है कि बाधाएँ वो डरावनी चिजें हैं जिसे आप तब देखते हैं जब आप लक्ष्य से अपनी नजरें हटा लेते हैं।

स्टीफन हाकिंग दुनिया के महान और अद्भूत वैज्ञानिक

July 20, 2017
मूझे मौत से कोई डर नहीं लगता लेकिन मूझे मरने की भी कोई जल्दी नहीं है। क्योंकि मरने से पहले जिंदगी में बहूंत कूछ करना बांकि है। ऐसा कहना है महान और अद्भूत वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग का जिसका शरीर का कोई भी अंग काम नहीं करता वो चल नहीं सकते बोल नहीं सकते वो कूछ कर नहीं सकते लेकिन फिर भी जीना चाहते हैं। स्टीफन का कहना है कि मृत्यु तो निष्चित  है लेकिन जन्म और मृत्यु के बीच कैसा जीना चाहते है। वह हम पर निर्भर करता है। चाहे जिन्दगी जितनी भी कठिन हो लेकिन आप हमेशा कुछ न कुछ कर सकते हैं और सफल हो सकते हैं स्टीफन का जन्म 8 जनवरी 1942 में इंग्लैण्ड के आक्सफोर्ड शहर में हूआ था। जब स्टीफन हाकिंग का जन्म हूआ उस समय द्वितीय विष्व युद्ध चल रहा था। स्टीफन के माता पिता लंदन के हायगेट सिटी में रहते थे। जहां पर अक्सर बमबारी हूआ करती थी। जिसकी वजह से वह अपने पुत्र के जन्म के लिए आक्सफोर्ड चले आये। जहां पर सुरक्षित रुप से स्टीफन हाकिंग का जन्म हो सका बचपन से ही स्टीफन हाकिंग बहूंत इंटैलिजेंट थे। उनके पिता डॉक्टर और मां हाउस वाईफ थी। स्टीफन का बूद्धि का परिचय इसी बात से लगाया जा सकता है।



कि बचपन में लोग उन्हें आईस्टिन कह कर पुकारते थे। उन्हें गणित में बहूंत दिलचस्पी थी। यहां तक की  उन्होने पुराने इलेक्ट्रानिक्स उपकरणों से कम्प्यूटर बना दिया था। 17 वर्श की उम्र में उन्होने आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रवेश ले लिया आॅक्सफोर्ड में पढ़ाई के दौरान उन्हें अपने दैनिक कार्यों को करने थोड़ी दिक्कत आनें लगी थी। एक बार स्टिफन छुट्टियाँ मनाने के लिए अपने घर पर आए थे तभी वह सिढ़ियों से उतरते समय बेहोंस हो गए और निचे गिर गये  शुरु में सभी ने कमजोरी मात्र मानकर ज्यादा ध्यान नहीं दिया लेकिन बार-बार इसी तरह बहुत से अलग-अलग प्राबलमस होने के बाद जांच करवाया तो पता चला कि उन्हें कभी भी न ठीक होने वाली बीमारी है। जिसका नाम यूरान मोटार डीसीस था। इस बिमारी में मासपेसिंयो को निरंतरीत करने वाली सारी नसें धिरे-धिरे काम करना बंद कर देती है। जिससे षरीर अपंग हो जाता है और पूरे अंग काम करना बंद कर देते हैं। ड़ाॅ. का कहना था कि स्टीफन अब दो वर्श तक और जी सकते हैं। क्योंकि अगले दो वर्शों में उनका शरीर धिरें-धिरे पूरा काम करना बंद कर देगी।



स्टीफन को भी इस बात का बड़ा सदमा लगा लेकिन उन्होने कहा कि मैं ऐसे नहीं मर सकता मूझे जीवन में अभी बहूंत कूछ करना बांकि है। स्टीफन अपनी बीमारी को दरकिनार कर तुरन्त अपने वैज्ञानिक जीवन का सफर शुरु किया और अपने आप को पूरी तरह विज्ञान को समर्पित कर दिया। धिरे-धिरे उनकी ख्यात पूरी दूनिया में फैलने लगी उन्होने अपनी बीमारी को वरदान के रुप में समझ लिया था। लेकिन वहीं दूसरी तरफ उनका शरीर भी उनका साथ छोड़ता चला जा रहा था। धिरे-धिरे उनका बांया हिस्सा पूरा काम करना बंद कर दिया बीमारी बढ़ने पर उन्हें बील चेयर का सहारा लेना पड़ा।


उनकी ये चेयर एक कम्प्यूटर के साथ बनी है। जो उनकी सर उनकी आंखों से पता लगा लेती है कि वह क्या बोलना चाह रहे हैं। धिरे-धिरे स्टीफन का पूरा शरीर काम करना बंद कर दिया था। लेकिन उस बीमारी में एक पलस पाइंट भी था कि स्टीफन सिर्फ शारिरीक रुप से अपंग हो रहे थे। ना कि मांसिक रुप से उसके बाद लोग यूं ही देखते चले गए और हाकिंगस मौत को मात पे मात दे रहे थे। उन्होने ब्लैक होल का कान्सेपट और हाकिंगस रेडिऐषन का महान विचार दूनिया को दिया उन्होने अपने विचारों को और सरल भाषा में समझाने के लिए एक किताब लिखी ।ABRIFE HISTORY OF TIME  जिसने दूनिया भर के विज्ञान जगत में तहलका मचा दिया। दोस्तों स्टीफन हाकिंग एक ऐसा नाम है जिन्होने शारिरीक रुप से विक्लांग हाने के बाउजूद अपने आत्म विष्वास के बल पर विष्व का सबसे अनूठा वैज्ञानिक बन कर दिखाया है। जो न केवल विष्व में अद्भूत न कि सामान्य  लोगों के लिए प्रेरणा बने हैं।          

नेल्सन मंडेला के संघर्षो को जाने

July 20, 2017
दोस्तों एक ऐसा भी समय था जब हर सुविधाएं जंग के आधार पर बटी हुई थी। बात चाहे बस की सीट की हो या फिर सार्वजनिक जगहों पर मिलने वाली किसी भी सुविधाओं की हर जगह रंग के आधार पर गोरों को अच्छी और कालों को बूरी सर्विस मिलती थी। वैसे तो इसका इफेक्ट हर देषों में लगभग कहीं थोड़ा कहीं ज्यादा था लेकिन दक्षिण अफ्रीका में हद ही हो गई थी। वहां के कूल अबादी के तीन चैथाई काले लोग थे और उनके देष के इकोनामी उन्हीे के मेहनत पर चलती थी। वैसे  तो दक्षिण अफ्रीका मे रेगों को लेकर भेद भाव बहुंत पहेले से था लेकिन नेषनल पार्टी के सरकार ने 1948 में यह नियम गना दिया कि काले और गोरों लोग अलग-अलग जगहों पर रहेंगे और हर सुविधाएं भी उनके रंगों के हिसाब से बाट दिया गया लेकिन बुराइ पर तो हमेषा अच्छाई की ही जीत होती आयी है। नेलषन मंडे़ला के संधर्शो  ने इस रंग भेद के नियम को खतम करवा दिया जिसके बाद सभी  को सामान हक मिलने लगा लेकिन यह इतना आषान भी नहीं था।


इसके लिए मंडेला को अपने जीवन का लगभग 28 साल जेल में बीताना पढ़ा था। मंडे़ला भी गांधी जी के राह पर चलने वाले इंषान थे उन्होने बिना हथियार उठाये बिना खून बहाये यह काम कर दिखाया था। दोस्तों आइऐ उनके बारें में डिटेल से जानते हैं। नेलषन मंडेला का जन्म 18 जुलाई 1918 को अफ्रीका के मवेजो गांव में हूआ था। उनकी मां का नाम नोस्केटी और पिता का गेटला हेनरी था। जन्म के समय नेलषन मंडेला का नाम उनके घर वालों ने रोलिल हाला रखा था जिसका मतलब षरारती होता है। लेकिन स्कूल के टीचर ने उनका नाम बदलकर नेलषन रख दिया। ने अपनी षूरू की पढ़ाई कलार्क बेरी मीसनरी स्कूल से षूरू की मंड़ेला जब बारह साल के थे तभी उनकी पिता की मृत्यु हो गई लेकिन उनके ज्वाइन फैमली ने उन्हें पिता की कमी महसूष कभी नहीं होने दी और आगे की पढ़ाई के लिए पूरी हेल्प करते रहे क्योंकि नेलषन परे परिवार में एक मात्र सदस्य थे जो स्कूल गए थे। उनकी ग्रेजूएषन की पढ़ाई हेल्डटाउन काॅलेज में हूई थी। हेल्डटाउन स्पेसली काले लोगों के लिए बनाया गया काॅलेज था। इसी काॅलेज में मंड़ेला की मूलाकात अलीवर्डटाम्बो से हूआ जो जीवन भर उनके दोस्त रहे और रंग भेद की लड़ाई में हमेषा उनके साथ रहे।


 काॅलेज के समय से ही उन्होने काले लोगों के भेदभाव के खिलाफ लड़ाई षुरू कर दी थी और लोगों को ईकटठा करना षुरू कर दिया था। जिसकी वजह से उन्हें काॅलेज से भी निकाल दिया गया था। 1994 में वे अफ्रीकन नेषनल कांग्रेष में षामिल हो गए जिसमें रंग भेद के खिलाफ जंग पहले से ही षूरू कर रखा था फिर वे 1947 में वे पार्टी के सचिव चूने गए अब उनके साथ धिरे-धिरे करके बहूंत सारे लोग जूड़ चूके थे और अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ रहे थे लेकिन 1961 में मंड़ेला और उनके कूछ दोस्त के खिलाफ देष द्रोह का केष चला और उन्हें जेल में बंद कर दिया गया गया हालाकि उन्हें बाद में उन्हें निर्दोश माना गया और वे छूट गए लेकिन फिर से 5 अगस्त 1962 को उन्हें मजदूरों को उकसाने के आरोप में फिर से गिरफतार कर लिया गया और दो साल तक उन पर केष चलने के बाद 12 जूलाई 1964 को उन्हें उम्र कैद की सजा सुनाई गई।


 सजा के लिए उन्हें सबसे कड़ी सुरक्षा वाली जेल में भेजा गया लेकिन उसके बाद भी उनका हौसला कम नहीं हुआ उन्होनें जेल में भी अष्वेत कैदियों को अपना अधिकार दिलाना षूरू कर दिया उधर दूसरी तरफ उनके पार्टी ने भी उन्हें छूड़ाने की पूरी प्रयास की लेकिन वह असफल रहे और नेलषन मंड़ेला पूरी 27 साल तक उस काल कोठरी में कैद रहे आखिरकार 1989 को दक्षिण अफ्रीका में सरकार बदली और उदारवादी नेता थ्ॅ ब्संताम देष के प्रेषीडेन्ट बने उन्होने उनके पार्टी के सधर्श को देखते हूए अष्वेत लोगों पर लगे सभी प्रतिबंध को हटा दिया और उन सभी कैदियों को छोड़ने का फैसला किया जिन पर खून खराबा जैसी बड़ी अपराधिक केषेस नहीं चल रही इस तरह 1 फरवरी 1990 को मंड़ेला के सामने जिन्दगी की सोर्योदय हूआ और वे जेल से छूट गए और उनके बाद 1994 में दक्षिण अफ्रीका में प्रेसीडेंट का चुनाव हूआ इस चुनाव में अष्वेत यानी काले लोग भी पार्टी सिपेट कर सकते थे। मेंडेला ने इस चुनाव में पाटि सिपेट किया और उनकी पार्टी अफ्रीकन नेषनल कांग्रेष ने बहूमत के साथ सरकार बनायी। 10 मई 1994 को मंड़ेला अपने देष के सबसे पहले अष्वेत राश्ट्रपति बने और बची खुची सभी अधिकारों को गोरे और काले सभी लोगों के लिए बराबर कर दिया।


नेलषन मंड़ेला बहूंत हद तक महात्मा गांधी की तरह अहिंषक मार्ग के समर्थक थे उन्होने गांधी को अपना प्रेरणा स्त्रोत माना था। इसी वजह से उन्हे अफ्रीकी गांधी भी कहा जाता है। नेलषन मंड़ेला को 1990 को भारत के सबसे बड़ा पुरुस्कार भारत रत्न दिया गया था। वे ऐसे दूसरे विदेषी थे जिन्हें भारत रत्न दिया गया था इससे पहले 1980 में मदर टेरेसा को दिया गया था। उसके बाद 1993 में उन्हें परि दूनिया के षांति के लिए सबसे बड़े पुरुस्कार नोबल पुरुस्कार से नवजा गया। दोस्तों मंड़ेला जीवन भर रंग भेद के अगेंष लड़ते रहे और दक्षिण अफ्रीका में अष्वेतों को उनके अधिकार दिलाने के बाद 5 दिसम्बर 2013 को 95 साल के उम्र में इस दूनिया को अलविदा कह गये। मुंड़ेल7ा का कहना था कि जब कोई व्यक्ति अपने देष और लोगों की सेवा को अपने कर्तव्य की तरह समझता है तो उन्हें उस काम को करने में षांति मिलती है। मुझे लगता है कि मेने वो कोषिष की है और इसलिए मैं षांति से अंत काल तक सो सकता हूँ।   

Isaac Newton Biography in Hindi - | दुनिया के जाने माने मशहूर वैज्ञानिक - आईजेक न्यूटन |

July 20, 2017
कोई भी सोंच एक बड़ी सोंच के बिना नहीं कि जा सकती ऐसा कहना है दूनिया को गुरुत्वाकर्शण का सिद्धांत देने वाले महान वैज्ञानिक (Isaac Newtan) आईजेक न्यूटन का जिन्होने अपनी सोंच केे दम पर इस विश्व  को एक ऐसे वैज्ञानिक सिद्धांत दिए जिसके बिना हम विज्ञान के बारे में सोंच भी नहीं सकते हैं।

न्यूटन के जीवन के बारे में बताने से पहले में अपको उसकी कूछ खोज के बारे में बता देता हँू। न्यूटन ने (Low of Gravity) यानि गुरुत्वाकर्शण बल की खोज की थी। उन्होने बताया की   गुरुत्वाकर्शण बल नाम की एक शक्ति है जो हर चीज को अपनी तरफ खिंचती है.


और इसी बल की वजह से चन्द्रमा पृथ्वी की चक्कर लगाता है और पृथ्वी सूर्य का इसके अलावा न्यूटन के गतिकीय तीन नियम यानि  Low of Motison फिजिक्स में सबसे ज्यादा प्रयोग किये जाते हैं। इन नियमों को एक सायकल से लेकर हवाई जहाज बनाने तक फालो किया जाता है। 




इसके आलावा भी उन्होने बहुत सारे खोज किए लेकिन आज हम उनके खोज के बारे मे नहीं बल्की उनकी खोज के बारे में जानेगे तो चलिए षुरु करतें हैं। सर आईजेक न्यूटन का जन्म 25 दिसम्बर 1642 को एक बहँूत ही गरीब परिवार में हूआ था। 



उन्हें पिता का प्यार नहीं मिल सका क्यों कि उन्के पिता की मृत्यु उनके इस दूनिया में आने से करीब 3 महिने पहले हो चूकी थी। न्यूटन के जन्म से ही बहँूत ही कमजोर पैदा हूए थे और उन्हें बचा पाना लगभग नामूमकिन सा था। लेकिन षायद उपर वाले ने न्यूटन को महान कार्यों को लिए जीवित रखा और बहँूत मूस्किलों के बाद उनकी जान बचाई जा सकी थी। 




आइजेक का नाम उनके स्र्वगवासी पिता के ही नाम पर रखा गया था। जब न्यूटन 3 साल के थे तो उनकी माँ ने दूबारा षादी कर ली लेकिन न्यूटन के षौंतेले पिता को वह बिलकूल भी पसंद नहीं थे। इस लिए उनके माँ ने उन्हें उनके दादा दादी के पास छोंड दिया और वह अपने दूसरे पति के साथ रहने लगी षुरवाती दिनों में न्यूटन ठीक से बोल भी नहीं पाते थे.

और साथ ही साथ जिददी और गूस्सैल स्वभाव के थे। इसलिए उनके कोई दोस्त नहीं हूआ करते थे और लोग उन्हें पागल भी बोलते थे। वे षूरु से ही चाँद तारे के बारे में सोंचते रहते और अपने दादा दादी से उसके रिलेटिव कूवेष्चन किया करते थे। 

लेकिन उनके दादा दादी उनके सवाल का ठीक से जवाब नहीं दे पाते थे। क्योकि उस समय तक विज्ञान में बहँूत ही कम खोज हो पाया था। 12 साल के उम्र में उन्होने स्कूल जाना षूरु किया। उनकी षूरु की पढ़ाई  The King*s School Grantham में हूई। 



वह पढ़ने में बिल्कूल भी अच्छे नहीं हूआ करते थे और उनके पढ़ाई में कमजोर होने की वजह से स्कूल में बच्चे उनका मजाक उड़ाते इस बात की वजह से उनका क्लासमेट के साथ झगड़ा होता रहता था यहाँ तक की उनके झगड़े की वजह से उन्हें स्कूल से भी निकाल दिया गया। इसी बीच उनके दूसरे पिता की भी मृत्यु हो गई और फिर से न्यूटन अपनी माँ के पास आ गए। अब उनके घर में इंकम का कोई भी स्त्रोत नहीं बचा था।  और खर्चे चलाना भी बहँूत ही मूस्किल हो रहा था। इसीलिए न्यूटन की माँ चाहती थी की अब न्यूटन खेती कर ले और अपनी घर संभाले लेकिन न्यूटन का मन खेती में बिल्कूल भी नहीं लगता था। 



इसीलिए स्कूल दकमे प्रिंसिपल से बात करके न्यूटन की माँ ने उन्हें फिर से स्कूल भेजना षुरु कर दिया। लेकिन इस बार न्यूटन ने उस स्टूड़ेंट से बदला लेने की सोंच ली जिसकी वजह से वह स्कूल से निकाले गये थे और पूरी सिद्दत के साथ पढ़ाई करने लगे औ जल्द ही पूरी स्कूल के टापर्स में गिने जाने लगे और उसके बाद 1661 में अपने एक अंकल के माध्यम से न्यूटन को  Trinity Coollege Combridge    में ऐडमिषन मिल गया। वहाँ वह अपनी फिस भरने और खूद के खर्चों को चलाने के लिए काॅलेज के अमीर स्टूडेंटस के यहाँ काम करते थे। 



इसी बीच 1664 में उन्हें अपने काॅलेज से स्काॅलरसिप भी मिली किसकी वजह से वह अपनी पढ़ाई और रिष्र्च पर ज्यादा ध्यान दे सकते थे। और फिर काॅलेज में ही 1665 में कूछ मैथेमैटिकल्स  Low  का खोज किया जिसके बाद में बंसबनसने  नाम दिया। 1665 में ही उन्हाने बीए की भी पढ़ाई पूरी की और आगे की पढ़ाई के लिए ऐमे में एड़मिषन की सोंची लेकिन एड़मिषन के समय में ही अचानक लंदन में फ्लैग की बीमारी फैल गई जिससे षहर को कूछ महीनो के लिए बंद कर दिया गया था और इसीलिए वह अपनी माँ के पास वापस आ गए और घर पर ही अगले 2 सालों तक  Lwo of Motion  और  Low of Gravity के अपने सिद्धांतो पर काम करना षुरु कर किया। देखते ही देखते अगले कूछ सालों में कड़ी मेंहनत के बाद उन्होंने  सफलता पा ली और दूनिया को दिखा दिया जिद्दी, गूस्सैल और पागल लड़का अगर चाह ले न तो कूछ भी कर सकता है। 



अपने सिद्धांतो से दूनिया को बदलने के बाद 20 मार्च 1727 को लंदन षहर में न्यूटन की मृत्यु हो गई। दोस्तों आईजेक न्यूटन के महान सिद्धांतों की वजह से आज नए खोज संभव हो पाते हैं। आज के वैज्ञानिक भी न्यूटन के खोज को सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं और उन्हीं के सिद्धांतो पर काम करते हैं। दोस्तों मनुश्य अपने विचारों से बना होता है। वह जैसा सोंचता है वह वैसा ही बन जाता है। अपनी सोंच हमेषा पाजिटिव रखिए क्यिोंकि दूनिया में कूछ भी असंभव नहीं है।         

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Udupi Ramachandra Rao Biography in Hindi - | भारत के महान स्पेस साइंटिस्ट - उडुपी रामचंद्र राव |

July 20, 2017
10 मार्च 1932 को कर्नाटक के अमद्र गांव में जन्में उडुपी रामचंद्र राव स्पेस साइंटिस्ट हैं। वह इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गनाइजेषन के चेयरमैन रह चुके हैं। अभी वह फिजिकल रिसर्च लेबोरेट्री की गवर्निंग काउंसिल के चेयरमैन हैं। वह इंडियन इंस्टीट्यूट फोर स्पेस साइंस एंड टेक्नोलाॅजी तिरुवनंतपुरम के चांसलर भी हैं। उन्हें हाल ही में वर्श 2017 में पद्म विभूशण अवार्ड के लिए चुना गया है। वर्श 1976 में उन्हें पद्म भूशण अवार्ड प्रदान किया जा चुका है।




              साराभाई के निर्देषन में की है पीएचडी


यूआर राय ने मद्रास यूनिवर्सिटी से बीएससी की। बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से एमएससी की और गुजरात यूनिवर्सिटी से डाॅ. विक्रम साराभाई की निर्देषन में पीएचडी की। वह एम आईटी में फैकल्टी मेंबर के रुप में काम कर चुके हैं। वह यूनिवर्सिटी आॅफ टेक्सास में असिस्टेंट प्रोफेसर के रुप में भी काम कर चुके हैं। वह 1966 में भारत लौट आए।    



                                                              सैटेलाइट के क्षेत्र में षानदार काम 

>़यूआर राव आफॅ सोसायटी सैटलाइट सफलता प्रोफेषनल्स इंटरनेषनल द्धारा 2013 में आयोजित सेमेंमनी में सैटेलाइट हाॅल आॅफ फेम में षमिल हो चुके हैं। राय ने अपनी कैरियर की षुरुआत काॅस्मिक किरण वैज्ञानिक के रुप में की थी। उनके निर्देषन में भारत कई सैटेलाइट सफलतापूर्वक लाॅन्च कर चुका है। सैटेलाइट के फील्ड में वह षानदार काम कर चुके हैं।  

  

स्पेस साइंस में जाना.माना नाम


राय ने इसरो के चेयरमैंन बनने के बाद राॅकेट टेक्नोलाॅजी के विकास पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया। कई नेषनल एवं इंटरनेषनल जर्नल्स में उनके 300 से ज्यादा साइंटिफिक और टेक्नीकल पेपर्स प्रकाषित हो चुके हैं। वह प्रसार भारती के पहले चेयरमैन रह चुके हैं। वह कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। अपने बेहतरीन काम की बदौलत आज स्पस साइंस के फील्ड में जाना.माना नाम है।    




Swati Bhargava Biography in hindi - | स्वाति भार्गव, कैशकरो डाॅट काॅम की सह . संस्थापक |

July 20, 2017
भारत की सबसे तेजी से उभरती कैषबैक वेबसाइट कैषकरो डाॅट काॅम की सह- संस्थापक और सीईओ स्वाति भार्गव ने अपे्रल 2013 में यह वेबसाइट लाॅच की थी।  षुरुआजी 4 महीनो में ही तकरीबन 2 लाख फैंस के साथ कैषकरो डाॅट काॅम भारत की लीडिंग कैषबैक साइट बन गई। स्वाति पंजाब के अंबाला षहर से हैं। कैषकरो से पहले उन्होने अपने पती के साथ मिलकर वर्श 2011 में पेरिंग पाउंड्स वेबसाइट भी षरु की थी।


             अपने आइडिया पर विषवास करें


एक एंटरप्रेन्योर के रुप में स्वाति का मानना की वर्क. लाइफ बैलेंस को मैनेज करना हमेषा ही चुनौतीपूर्ण होता है।  वह कहती है कि अपने आइडिया पर विष्वास करना जरुरी होता है। अगर कोई आपके आइडिया के बारे में सवाल करें तो घबराएं नहीं, बल्की अपने आइडिया पर गर्व करें। इसके साथ ही वह यह मानती है कि प्रोडक्ट के लिए सही नेटवर्किंग बहूंत जरुरी है।  

 

                                                     ठुकराया आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का आॅफर


बचपन में ही स्वाति भार्गव आॅक्सफोर्ड यूनिवरसिटी से पढ़ाई करना चाहती थी, लेकिन जब उन्हें वहां से आफर मिला तो उन्होने उसे ठुकरा दिया। आॅक्सफोर्ट की बजाय उन्होने वर्श 2005 में लंदन स्कूल आॅफ इकोनाॅमिक्स (एलएसई) से मैथेमेंटिक्स और इकोनाॅमिक्स में आॅनर्स किया। उन्हें एलएसई और सिंगापूर सरकार की ओर से स्काॅलरषिप भी दी गई थी।


     


         गोल्डमैन साक्स में किया है काम


स्वाति ने लंदन में जानी.मानी बैंक गोल्डमैन साक्स में अपनी समर इंटर्नषिप की। उसके बाद उन्हें वहीं फुल टाइम जाॅब का आॅफर मिल गया। उन्होने 4 साल तक इस बैंक के लिए काम किया। इसके बाद साल 2010 में स्वाति ने नौकरी छोड़ दी। उन्होने अपने पति राहन के साथ यूके में कैषबैक बिजनेस में कदम रखा और पेरिंग पाउंड्स नाम से एक इंटरप्राइज षुरु की।

 

Sandeep Das biography in hindi - | तबले का जादूगर - संदीप दास, ग्रैमी अवार्ड विजेता |

July 20, 2017

छह सालकी उम्र में ही संदीप दास खिलौने के बजाय टबले के मांग करते थे। एक बार स्कूल के एक टीचर ने उनके पिता से सिकायत की थी की वह पढ़ाई के दौरान मेज पर उंगली थिरकाते रिहते हैं। यहीं वो निषानियां थी, जिनसे तय हो गया की संदीप दास एक प्रसिद्ध तबला वादक बनने वाले हैं। उन्हें 59वें ग्रैमी अवाड्र्स से सम्मानित किया गया। उन्को सिल्क रोड़ एन्सेंबल ग्रप के साथ बेस्ट ग्लोबल म्यूजिक के लिए ग्रैमी अवार्ड दिया गया।वह 9 साल के उम्र में तबला गुरू पंडित किषन महराज के पास बनारस पहुंच गये।

                                                               संगीत के कारण मिला गोल्ड मेडल


संदीप का जन्म 23 जनवरी, 1971 को पटना में हुआ। उनका परिवार मुल रूप से पष्चिम बंगाल से था। संदीप ने अपनी स्कूलिंग सेंट जेवियर्स हाई स्कूल, पटना से की। उन्होनें बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से इंग्लिष लिटरेचर में गोल्ड मेडल के साथ ग्रेजुएषन पूरी की। वह कहते हैं कि अगर संगीत से जुडे हैं तो आपकी मेमोरी अच्छी हो जाती है। 

        परिवार की वजह से मिली सफलता


संदीप के पिता जी उनको तबला सिखाने के लिए परिवार के साथ बनारस सिफ्ट हो गए। वर्श 1990 में संदीप प्रोफेषनल तबला वादक बनने के लिए दिल्ली पहंुचे। वह कहते हैं की मैं जो कुछ भी हुं, परिवार के वजह से हुं। परिवार ने मुझे अपने षौक पर गंभीरता से विचार करने का मौका दिया। हम मध्यमवर्गीय परिवार से थे, पर फिर भी षौक पूरा करने का मौका दिया।

          

               हमारा फोकस हुनर पे हो 


वर्श 2000 में चीनी मूल के अमरीकी संगीतकार यो यो मा के साथ हुई मुलाकात ने संदीप की दूनिया बदलकर रख दी। वह यो यो मा के साथ मिलकर परफाॅर्मेंस देते हैं। 2003 और 2009 में संदीप का नामांकन ग्रैमी अवार्ड के लिए हुआ था, पर उन्हें अवार्ड नहीं मिला वह कहते हैं कि भारत के लोग सिर्फ पढ़ाई की तरफ ध्यान देते हैं, जबकि हुनर पर फोकस होना चाहिए।  
  

सहीं फैसला लेने की क्षमता के कारण जेडी डाॅट काॅम के फाॅउंडर- लिउ कीअंगडोंग

July 20, 2017

14 फरवरी 1974 के जियांगसु में पैदा हुए लिउ कीअंगडोंग चीन के इंटरनेट एंटरप्रेन्योर हैं। उन्हें रिचर्ड लिउ के नाम से भी जाना जाता है। वह जेडी डाॅट काॅम के संस्थापक हैं। यह एक चीनी इलेक्ट्रोनिक ई-काॅमर्स कंपनी है। लिउ के पास 1.8 बिलियन अमेंरिकी डाॅलर की कुल संपत्ति है। अपने जीवन के षुरुआती दौर में उन्होने राजनीति में रुचि ली। वर्श 1996 में उन्होंने समाजषास्त्र में बैचलर्स डिग्री प्राप्त की। कड़ी मेहनत के बदौलत वह वह बिजनेस में तेजी से सफल हुए।


           

             सहीं समय पर सहीं फैसला लें


वर्श 2004 में लिउ ने अपनी पहली आॅनलाइन रिटेल वेब्साइट षुरु की। बाद में इसी वर्श जेडी डाॅट काॅम षुरु की। वर्श 2005 में उन्होने अपने सभी ब्रिक एडं मोर्टार स्टोर्स बंद कर दिए और ई-काॅमर्स कें फील्ड मेकं तेजी से कदम बढ़ाने लगे। लिउ अपनी सफलता के बारे में कहते है कि सहीं फैसला लेने की क्षमता के कारण ही वह सफल हो पाए हैं।



           कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग सीखने लगे... 


लिउ ने चाइना यूरोप इंटरनेषनल स्कूल से ईएमबीए किया। जब उन्हें लगा की सिर्फ डिग्री लेने से नौकरी नहीं मिलेगी, तो उन्होंने कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग सिखने के समय ही बिताना षुरु किया। काॅलेज के पढ़ाई के दौरान ही उन्हासेनें प्रोग्रामिंग से होने वाली आय को रेंस्टोरेंट वेंचर में निवेष किया। उस समय यह बिजनेस कुछ महीनों में ही फेल हो गया।

     

         डिस्ट्रीब्यूटर के रुप में काम किया   


गे्रजुएषन के बाद लिउ ने जपान लाइफ कंपनी में काम करना षुरु किया। वहां उन्होनें डायरेक्टर फोर कम्प्यूटर्स और डायरेक्टर फोर बिजनेस के रुप में सफलतापूर्वक काम किया। दो साल काम करने के बाद 1998 में उन्होनें मैग्नेंटो-आॅप्टिकल प्रोडक्ट्स के एक डिस्ट्रीब्यूटर के रुप में खुद का बिजनेस षुरु किया। वर्श 2003 तक उन्होनें 12 स्टोर खोल लिए।


सहवाग के संग 300 क्लब में करुण नायर

July 20, 2017
25 साल के इस युुवा भारतीय क्रिकेट का नाम आज हर क्रिकेट प्रेमी की जुबान पर है। हो भी क्यों नहीं, करुण नायर ने इतनी छोटी उम्र में कारनामा ही इतना बड़ा किया है। उन्हानेे अपने तीसरे अंतरराश्ट्रीय मैच में तिहरा शतक जमाकर अपना नाम दूनिया के दिग्गज क्रिकेटर्स की सूचि में षामिल कर लिया है। भारत और इंग्लैण्ड के बीच चली टेस्ट सीरीज के 5वें टेस्ट मैच में करुण नायर नाबाद 303 रन बनाकर अपने अंतरराश्ट्रीय कैरियर के पहले शतक को तीहरे शतक में बदलकर वीरेंद्र सहवाग के संग 300 क्लब में आ गए हैं।

         

          स्वभाव से काफी षर्मीलें हैं करुण


क्रिकेटर करुण नायर का जन्म 6 दिसम्बर 1991 को राजस्थान के जोधपूर में हूआ था। हालाकी वे मूल रुप से केरल के रहने वाले हैं। स्टेट लेवल पर करुण कर्नाटक की ओर से खेलतें हैं। क्रिकेट की मैदान पर खुल कर खेलने वाले और गेदबाजों के हांेष उड़ाने वाले करुण नायर काफी षर्मिलें हैं और कम बोलते हैं। वह किसी के साथ जल्दी धूल मिल नहीं पाते।

         

         शानदार खेल से बनाई पहचान 


करुण नायर ने अपना फस्र्ट क्लाॅस डेब्यू 2013 में किया, जबकि अंतरराश्ट्रीय क्रिकेट में साल 2016 में डढेब्यू किया। फस्र्ट क्लास में करुण का प्रदर्षन षानदार था। उनके षनदार खेल को देखते हूए ही आईपीएल 2016 में दिल्ली डेयरड़ेविलस ने उन्हें 4 करोड़ रुपए की बोली लगाकर खरीदा, जबकि उनका बेस प्राइस महज 10 लाख रुपए था।


     

           मिली थी शारीरिक मेहनत की सलाह


अपने अंतरराश्ट्रीय कॅरियर के तीसरे मैच ही में परिपक्व खेल का प्रदर्षन करन वाले करुण नायर प्री मेच्योर बेबी थे। इस वजह से बचपन में उनके फेफ्ड़ों की क्षमता कम थी। ड़ाॅक्टर्स नें उन्हें षरिरीक मेहनत की षलाह दि। इस वजह से उनके पिता उन्हें क्रिकेट के मैदान तक लेकर गए। षानदार खेल के चलते करुण भविश्य में कई रिकाॅड्र्स तोड सकते हैं।  

 




थेरेसा में, ब्रिटेन की नई प्रधानमंत्री

July 20, 2017


1 अक्टूबर 1956 को ईस्टबाॅर्न में जन्मी थेरेसा में ब्रिटेन की नई प्रधानमंत्री है वह 1992 और 1994 में हाउस आॅफ कामन्स के चुनाव में विफल हो चुकी थी 1997 में जनरल इलेक्षन में वह संसद चुनी गई । वह कन्जवेटिव पार्टी की चेयरपर्सन भी रही है। वह ब्रिटेन की दूसरी महिला प्रधानमंत्री है। इससे पहलें 1979 में मागरिट थैचर ब्रिटेन की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी थी थेरेसा 1999 से 2010 तक  कन्जवेटिव पार्टीके षैडों कैबिनेट मेंश्रम षिक्षा और पेषन मंत्री रह चुकी है। 



                        

बैंक आॅफ इंग्लैड में काम किया है।


थेरेसा ने आपने बयान में कहा की ब्रिटेन यूरोपिन संघ में वापास नही लौटेगा और वह आपने दम पर बेहतरीन ब्रिटेन बनाने के लिए कड़ी मेहनत करेगी वह 1977 से 1983 तक बैंक आॅफ इंग्लैड में काम कर चुकी है। 1985 सें 1997 तक उन्होने असोसिएषन फोर पेयमेट क्लीयरिग सर्विसेज में काम किया वह कुछ समय काउसलर भी रही है।






       
      स्ंासद में पहुंचें ज्यादा महिलाएं 



थेरेसा नें 1977 में यूनिवर्सिटी आॅफ आॅक्सफोर्ड से भूगोल में स्नातक किया । उन्हे गंभीर स्पश्टवादी दृढ़ निष्चयी और काठोर फैसले लेनी वाली महिला के रूप में जाना जाता है। वह कहती है कि ब्रिटेन की संसद में ज्यादा सें ज्यादा महिलाए होनी चाहिए तभी वें अपनें हको के लिए लड़ पाएगी।








       
   लगातार मेहनत से पुरे होते सपनें

थेरेसा के पति फिलिप में कैपिटल इंटरनेषनल में इन्वेस्टमेंट बैंकर है। दंपती के कोई संतान नही है। थेरेसा काफी धार्मिक प्रवृति की महिला है। वह चर्च प्रार्थना के लिए नियमित रूप् से जाती है।  कुकिंग का भी काफी षौक हैं। वह लेटेस्ट फैषन को फाॅलों करने के लिए महषुर है। उनका मानना है कि व्यक्ति लगातार मेहनत करे तों आपने सापनों को साकार कर सकता है।



पहली भारतीय अमरीकी महिला है- प्रमिला जयपाल

July 20, 2017


प्रमिला जयपाल अमरीकन राजनीतिज्ञ

21सितंबर 1965 को चेन्नइ में पैदा प्रमिला जयपाल भारत की मूल की  अमरीका राजनीतिज्ञ है। वह वाॅषिंगटन राज्य के सातवें कांग्रेसनल जिले सें प्रतिनिधि सभा के लिए चुनी गई है। वह अमरीकी प्रतिनिधि सभा के लिए निवीचित  पहली भारतीय अमरीकी महिला है।उनका जन्म  भारत के एक तामिल परिवार में हुआ । पांच साल की उम्र में ह ीवह इंडोनेषिया और सिंगापुर चली गई ।16 साल की उम्र में वह अमरीका आ गईथी ।यही पर उन्होनें आपनी पढ़ाई पूरी की






    

चैपियन आॅफ चेज के रूप में पहचान 


प्रमिला ने जाॅर्ज टाउन यूनिवर्सिटी सें बैचलर्स डिग्री प्राप्त की ओर नाॅर्थ वेस्टर्न यूर्निवसिटी सें एमबीए किया उन्होनें 11 सितंबर 2001 को अमरीका पर हुए हमलें अप्रवासी समूहों का वकालत के लिए हैट फ्री जोन की स्थापना की उन्होने आव्रजन  नीतीओं में सुधारों के लिए प्रयास के लिए वर्श 2013 में व्हाइट हाउस नें उन्हे चैपियन आॅप चेंज के रूप में पहचान दी







  भारत से है अब काफी लगाव


प्रमिला कहती है कि मैं गांधी के देष से आती हूं  कि  युद्ध हमारे लिए आखरी विकल्प होना चाहिए न की पहला । भारत और अमरीका  को मिलकर बहुत सारे काम करने है। वह कहती है।कि भारत मेरे लिए अतुलीय महत्व रखता है।मेरे माता पिता अब ही भी वह रहतें है। भारत से मेरा लगाव है। 







मूल्यों व आधिकारों के लिए संधर्श .......


प्रमिला प्रगतिवादी एजेडें पर काम करना चाहती है। वह कहती है।कि हम पीछे नही हट सकते हमारा इरादा उन चीजों के लिए लड़ते रहना है। जिसके लिए में आपनी जिंदगी भर लड़ती रही हूं। उनका मनना है ििक महिलाओं को आपने फैसले खुद लेने चहिए वह अमरिका के लिए आवष्यक मूल्यों और अधिकारी के लिए किसी भी हद तक संधर्श करने के लिए तैयार है।


सं. रा. महासभा के नए अध्यक्ष- पीटर थाॅमसन

July 20, 2017

पीटर थाॅमसन, सं. रा. महासभा के नए अध्यक्ष

फिजी के वरिश्ठ रातनयिक पीटर थाॅमसन संयुक्त राश्ट्र महासभा के अगले यानी 71 वें सत्र के अध्यक्ष है। पीटर आगामी 16 सितबर से यह पद्भार संभालने वाले पीटर वर्श 2010 से  संयुक्त राश्ट्र में फिजी के साथ स्थायी प्रतिनिधि रहें है। उन्हे चार वोटो के अंतर से वैष्विक संस्था के अध्यक्ष के रूप् में चुना गया है। संयुक्त राश्ट्रमहासभा का अध्यक्ष बननें के दौड में उन्होने साइप्रस के एडियाज मैवराइयानिस को पीछे छोडा है। थाॅमसन को ग्रामीण विकास और अतरराश्ट्रीय मामलों में अच्छा खासा अनुभव है।

                                                                    

 छोटे से देष आया अध्यक्ष...


पीटर ने आॅकलैड यूनिवसिटी से बीए पाॅलिटिकल स्टीज और कैब्रिज पीजी डिप्लोमा इन डवलपमेट स्टडीज की पढ़ाई की है। संयुक्त राश्ट्र महासभा के अध्यक्ष के रूप् में चुने जाने के बाद उन्होने कहा  की यह पहली बार संभव हो सकते है। कि प्रषात में एक छोटे सेद्वीप का काई विकास षील देष से इस बडी वैष्विक संस्था की अध्यक्षता करने जा रहा है। उन्हाने सिविल सर्विस सें ही आपना  कॅरियर षुरू किया।


           
  जलवायुपरिवर्तन है प्रमुख मुद्दा 



अध्यक्ष चुने जाने पर पीटर नें कहा कि अपने कार्यकाल के दौरान वह जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर विषेंश तौर से मुखर रहेगे उन्होने यह भी कहा  िकइस दौरान टिकाउ विकास के 2030 के एजेडे को आगे बढाने पर और सभी17लक्ष्यों को हासिल करने के लिए की दिषा मेें प्रगति पर खास जोर दिया जाएगा।



       
   प्रमुख  संस्थाओं के अध्यक्ष रहे है के  


महासभा के अगले सत्र के अध्यक्ष बनने जा रहें है। पीटर इससे पहले भी काई अहम संस्थाओ का नंेतृत्व कर चुके है। वह 2014 मं यूएनडीपी के कार्यकारी बोर्ड के अध्यक्ष बने यूएन ग्रुप आॅफ एषियन स्टेट्स का नाम बदलकर एषिया पैसिफिक ग्रुप करवाने में उनकी अहम भूमिका रही है। पीटर को फिजी राश्ट्रीपति के हाथों आॅडर आॅफ फिजी से नवाजा जा चुका है।

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